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FARIDABAD HARYANA GURUGRAM

BY:-SAHRAJ KHAN

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लम्हा है आरजू

हर लम्हा क्यों लगता है आरजू
हर बातें क्यों लगती हैं गुफ्तगु
हर महफिल क्यों लगती है साजिश
हर जगह क्यों लगती है काफिर
हर बातें क्यों चुबती है ए मुसाफिर
इंसानियत क्यों लगती है हैवानियत
लगता है दूर है जिंदगी
उस रहनुमाई की भी क्या है यह बंदगी
पहले हमें मिलाया फिर हमें रुलाया
फिर इतनी दूर उससे हमें लेकर आया
की मिले बस हमारी रूहें ही दोबारा

मां

जिंदगी के हर वक्त उनको याद कर
उनसे दूर जाकर ना खुद को आबाद कर
अंधेरे में तेरी परछाई भी काम ना आएगी
पर वह मां उस अंधेरे से तेरी परछाई भी खींच लाएगी
पर तू एक बार दिल से पुकार तो सही उसे
वह तेरे लिए सब चीज छोड़ कर आएगी

कभी फर्क पड़ा है

PicsArt_09-27-12.04.58.jpgपृथ्वी की गोलाई से
जिंदगी की बुराई से
लोगों की परवाई से
समाज की इंतिहाई से
नेताओं की झूठी भलाई से
धर्म के नाम पर काली कमाई से
गलत हराम की रहनुमाई से
गरीबों की रुलाई से
सही बोलने वालों की लड़ाई से
अनाथ बच्चों की पढ़ाई से
बच्चों को मुकत करो भीख मांगने की इंतिहाई से
बेगुनाहों की मौत की शहनाई से
मां बाप कि बच्चों की जुदाई से
अच्छे लोगों की फनाई से
जो सैनिक देश के लिए लड़े उनकी लड़ाई से
घर से बाहर लड़कियों की रिहाई से
लड़कियों की खेलो ना तुम भलाई से
कयों करते इतने काम तुम ए इंसान इंतिहाई (बुराई) से

IKHTIYAR

BY:- SAHRAJ_KHAN

सच्चाई है ना

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करना बहुत कुछ चाहते हो
पर किस्मत से ज्यादा कुछ नहीं कर पाते हो
संभल जाओ ऐ मुसाफिरो
हर वक्त सही नहीं होता
मेरे दोस्त
कभी वक्त के हिसाब से तो
कभी दूसरों के लिए खुद को बदल जाते हो

और फिर कभी अपना कुछ नहीं कर पाते हो

 

मंजिल है दूर इरादे हैं पास
नहीं है वो तो सब कुछ है माफ
जिंदगी की लड़ाई है ना
दुनिया की बुराई है ना
लोगों की बेवफाई है ना
हमारे हौसले की रहनुमाई है ना
उन बातों को सुनकर ही ना
हमने अपनी जिंदगी भी बुलंद बनाई है ना

 

IKHTIYAR

BY:- SAHRAJ_KHAN

जहन ए ख्याल

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जब वक्त की दूरियों ने बुलाया
तो जहन में उसका ख्याल आया
ख्वाहिशों की कश्मकश में खुद को पाया
दूर होकर भी हमने अपने आपको मनाया
पर क्या करें उन आरजू की दूरियो ने हमें रूलाया
पास होकर हमने अपने आप को इंतिहाई मैं पाया
लम्हों की साजिशों ने हमें डुबोया
दुनिया थमी रही हमें उन लम्हों ने भिगोया
फिर उन ख्यालों से हमारा दिल भर आया
हमने उन पलों को सोचकर खुद को रूलाया
जिन पलों का हमको अरसों बाद ख्याल आया

पर वक्त का क्या था

कंबखत(कमबखत)

सब खत्म हो चला हमारी आंख खुली तो हमने अपने आपको गहरी नींद में पाया

IKHTIYAR

BY: SAHRAJ_KHAN

हकीकत

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“कई लोगों की शख्सियत कुछ ऐसी होती है
हम करते उनसे दोस्ती वो कुछ और ही समझते हैं
हमारी जिंदगी में एक ही है
ए कंबखत लोगों
और हम उसी  प्यार करते है”
“अपनी शख्सियत के पीछे अपना हाथ होता है
अपनी किस्मत के पीछे अपनों का साथ होता है
इज्जत अपने हाथों में होती है
पर कंबखत (कमबखत) बिगाड़ और कोई चला जाता है”
IKHTIYAR

BY: SAHRAJ_KHAN

यह है जिंदगी ए ज़ीनत

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इस की और जाते नहीं जिंदगी मे लाते हैं यह ज़ीनत

बहते नहीं बहा ले जाते हैं यह ज़ीनत

संभलना चाहते पर संभलने देती नहीं है यह ज़ीनत

दूर जाना चाहते पर खींचती है यह ज़ीनत

बुलंदीयौ की तरफ जाना चाहते पर बहकाती है यह ज़ीनत

रोकना चाहते खुद को इससे पर खिचती है यह ज़ीनत

हमारे करीबियों से दूर ले जाती है यह ज़ीनत

संभल जाओ सपने दिखाती है ज़ीनत

सपने दिखाकर गिराती है यह ज़ीनत

नेक रास्तों पर जाने से बहकाती है यह ज़ीनत

हर लमहा देखने को तरसाती है यह ज़ीनत

मुकम्मल वक्त को खराब कर देती है यह ज़ीनत

हर रिश्तो में तकरार लाती है यह ज़ीनत

अर्श से फर्श तक और फलक से हलक तक ले जाती है यह ज़ीनत

जी आप तहजीब से बोलने वालों को तू तक लाती है यह ज़ीनत

लोगों को दिलों में लानी चाहिए यह ज़ीनत
सुंदरता का दूसरा नाम है यह ज़ीनत ।

IKHTIYAR

BY : SAHRAJ_KHAN

यह है मोहब्बतें इश्क

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“हर लम्हा अपनी आरजू दिखाती
पता नहीं कितनों को रुलाती
हमेशा खूबसूरती की ओर जाती
कभी हसीन लम्हों से तो कभी हसीन पलों से बहकाती यह मोहब्बतें इश्क”

“कभी रुलाती तो कभी तकरार कराती
दिलो-दिमाग पर छा जाती
कई महफिलों से टकरा जाती
ऊंचाइयों से जमीन पर लाती यह मोहब्बतें इश्क”

“हर रहनुमाई की औकात है यह दिखाती
ऐसा लगता जैसे दरख्त की छाया है यह दिलाती
हर बादशाही को अपने कदमों पर है यह गिराती
इतराते शख्सियत को अपने आगे है झुकाती यह मोहब्बतें इश्क”

“दूर होते हुए भी मुकम्मल सी है लगती
इसके नसे में चूर हो जाते पर फिर भी यह कम लगती
हर इंतिहाई में अच्छाई पैदा नहीं कर पाती
इत्तेफाक सा लगता है जब यह रूठ कर जाती यह है मोहब्बतें इश्क”

 

IKHTIYAR

BY: SAHRAJ_KHAN

 

 

पर ख्वाब बड़े

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“ख्वाब है बड़े कदम छोटे आंसू हमारे आंखों से रोते रास्तो में हम कई दफा सोते फिर भी चेहरे की हंसी और मंजिलों की आस कभी नहीं खोते इमारतों को देखे जाते सोच-सोच के वक्त खत्म होते चले जाते हम बढ़ते आगे की तरफ पर फिर वही आ जाते बढ़ना चाहते फिर गिर जाते ओर आज कम से कम कुछ कर गुजरने की आस लेकर गिर-गिर के संभल तो है जाते इन्ही अल्फाजों को सोच-सोचकर किस्मत को कोशे चले जाते पर हम भूल जाते वो बातें जो हमें याद दिलाते वो राते जब हमको खाना खाए दो-तीन दिन हो जाते”।

 

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“लोग कहते हैं कुछ करने के लिए कुछ खोना पड़ता है पर हमारे पास तो कुछ था ही नहीं इसलिए खोते क्या और पाते क्या हमें सपनों की आदत थी वह भी हमें ऐसे देखने को मिलते थे जैसे हमें खाने को क्योंकि हमारी जिंदगी में ना तो कमाई थी ना हमें जीने की रिहाई थी बस थी तो पेट की रुसवाई थी वह जगह जो हमने अपनी फितरत से कमाई थी वही हमारी अपनी हलाल की कमाई थी”।

 

IKHTIYAR

BY: SAHRAJ_KHAN