समझो हमें

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कई लोगों की शख्सियत कुछ ऐसी होती है
हम करते उनसे दोस्ती वो कुछ और ही समझते हैं
हमारी जिंदगी में एक ही है

ए कंबखत लोगों
और हम उसी से प्यार करते हैं

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जहन ए ख्याल

जब वक्त की दूरियों ने बुलाया
तो जहन में उसका ख्याल आया
ख्वाहिशों की कश्मकश में खुद को पाया
दूर होकर भी हमने अपने आपको मनाया
पर क्या करें उन आरजू की दूरियो ने हमें रूलाया
पास होकर हमने अपने आप को इंतिहाई मैं पाया
लम्हों की साजिशों ने हमें डुबोया
दुनिया थमी रही हमें उन लम्हों ने भिगोया
फिर उन ख्यालों से हमारा दिल भर आया
हमने उन पलों को सोचकर खुद को रूलाया
जिन पलों का हमको अरसों बाद ख्याल आया

पर वक्त का क्या था

कंबखत(कमबखत)

सब खत्म हो चला हमारी आंख खुली तो हमने अपने आपको गहरी नींद में पाया

IKHTIYAR

BY: SAHRAJ_KHAN

हकीकत

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“अपनी शख्सियत के पीछे अपना हाथ होता है

अपनी किस्मत के पीछे अपनों का साथ होता है

इज्जत अपने हाथों में होती है

पर कंबखत (कमबखत) बिगाड़ और कोई चला जाता है”

IKHTIYAR

BY: SAHRAJ_KHAN

यह है जिंदगी ए ज़ीनत

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        इस की और जाते नहीं जिंदगी मे लाते हैं यह ज़ीनत

बहते नहीं बहा ले जाते हैं यह ज़ीनत

संभलना चाहते पर संभलने देती नहीं है यह ज़ीनत

दूर जाना चाहते पर खींचती है यह ज़ीनत

बुलंदीयौ की तरफ जाना चाहते पर बहकाती है यह ज़ीनत

रोकना चाहते खुद को इससे पर खिचती है यह ज़ीनत

हमारे करीबियों से दूर ले जाती है यह ज़ीनत

संभल जाओ सपने दिखाती है ज़ीनत

सपने दिखाकर गिराती है यह ज़ीनत

नेक रास्तों पर जाने से बहकाती है यह ज़ीनत

हर लमहा देखने को तरसाती है यह ज़ीनत

मुकम्मल वक्त को खराब कर देती है यह ज़ीनत

हर रिश्तो में तकरार लाती है यह ज़ीनत

अर्श से फर्श तक और फलक से हलक तक ले जाती है यह ज़ीनत

जी आप तहजीब से बोलने वालों को तू तक लाती है यह ज़ीनत

लोगों को दिलों में लानी चाहिए यह ज़ीनत
सुंदरता का दूसरा नाम है यह ज़ीनत ।

IKHTIYAR

BY : SAHRAJ_KHAN

यह है मोहब्बतें इश्क

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“हर लम्हा अपनी आरजू दिखाती
पता नहीं कितनों को रुलाती
हमेशा खूबसूरती की ओर जाती
कभी हसीन लम्हों से तो कभी हसीन पलों से बहकाती यह मोहब्बतें इश्क”

“कभी रुलाती तो कभी तकरार कराती
दिलो-दिमाग पर छा जाती
कई महफिलों से टकरा जाती
ऊंचाइयों से जमीन पर लाती यह मोहब्बतें इश्क”

“हर रहनुमाई की औकात है यह दिखाती
ऐसा लगता जैसे दरख्त की छाया है यह दिलाती
हर बादशाही को अपने कदमों पर है यह गिराती
इतराते शख्सियत को अपने आगे है झुकाती यह मोहब्बतें इश्क”

“दूर होते हुए भी मुकम्मल सी है लगती
इसके नसे में चूर हो जाते पर फिर भी यह कम लगती
हर इंतिहाई में अच्छाई पैदा नहीं कर पाती
इत्तेफाक सा लगता है जब यह रूठ कर जाती यह है मोहब्बतें इश्क”

 

IKHTIYAR

BY: SAHRAJ_KHAN

 

 

पर ख्वाब बड़े

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“ख्वाब है बड़े कदम छोटे आंसू हमारे आंखों से रोते रास्तो में हम कई दफा सोते फिर भी चेहरे की हंसी और मंजिलों की आस कभी नहीं खोते इमारतों को देखे जाते सोच-सोच के वक्त खत्म होते चले जाते हम बढ़ते आगे की तरफ पर फिर वही आ जाते बढ़ना चाहते फिर गिर जाते ओर आज कम से कम कुछ कर गुजरने की आस लेकर गिर-गिर के संभल तो है जाते इन्ही अल्फाजों को सोच-सोचकर किस्मत को कोशे चले जाते पर हम भूल जाते वो बातें जो हमें याद दिलाते वो राते जब हमको खाना खाए दो-तीन दिन हो जाते”।

 

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“लोग कहते हैं कुछ करने के लिए कुछ खोना पड़ता है पर हमारे पास तो कुछ था ही नहीं इसलिए खोते क्या और पाते क्या हमें सपनों की आदत थी वह भी हमें ऐसे देखने को मिलते थे जैसे हमें खाने को क्योंकि हमारी जिंदगी में ना तो कमाई थी ना हमें जीने की रिहाई थी बस थी तो पेट की रुसवाई थी वह जगह जो हमने अपनी फितरत से कमाई थी वही हमारी अपनी हलाल की कमाई थी”।

 

IKHTIYAR

BY: SAHRAJ_KHAN